राजस्थान की झीलें Rajasthan GK

राजस्थान की झीले

hello friends आज हम इस आर्टिकल में राजस्थान की झीलों के बारे में पढेंगे
राजस्थान की झीलों को दो भागों में बांटा जा सकता है
(i)मीठे पानी की झीलें एवं
(ii)खारे पानी की झीले।
राज्य की खारी झीलों को ‘टेथिस सागर’ का अवशेष माना जाता है।

खारे पानी की झीलें-

सांभर झील (जयपुर-नागौर-अजमेर)-

सांभर झील 27° से 29° उत्तरी अक्षांशो एवं 74° से 75° पूर्वी देशांतरो के मध्य जयपुर एवं नागौर जिलों में स्थित है।

यह भारत में खारे पानी की सबसे बड़ी झील हैं सांभर की समुद्रतल से औसत ऊंचाई 370 मीटर है।

इस जेल में मेंथा (मेढा),  रुपनगढ़ ,खारी, खंडेला इत्यादि नदियों सहित विभिन्न नाले जल लाते है।

भारत सरकार की ‘हिंदुस्तान नमक कम्पनी’ द्वारा 1964 में ‘सांभर साल्ट परियोजना’ प्रारम्भ की गई, जो यहाँ पर नमक का उत्पादन करती है

यहां पर सोडियम सल्फेट बनाने का एक कारखाना भी है।

देश में नमक उत्पादन में 8% सांभर झील से प्राप्त किया जाता है।

यहां पर मुग़ल काल से ही नमक निकाला जा रहा है

डीडवाना झील (नागौर)-

27° उत्तरी अक्षांश एवं 74° पूर्व देशांतर पर स्थित डीडवाना झील की लंबाई लगभग 4 किलोमीटर चौड़ाई 3 से 6 किलोमीटर है यहां पर वर्षभर नमक तैयार किया जाता है

यहां पर राजस्थान सरकार द्वारा सोडियम सल्फेट बनाने का सबसे बड़ा संयंत्र स्थापित किया गया है।
क्लोराइड की जगह सल्फेट की मात्रा अधिक होने से यहां का नमक खाने में अयोग्य है।

इसका उपयोग चमड़ा व रंगाई छपाई उद्योग में किया जाता है (औद्योगिक नमक)

लूणकरणसर झील (बीकानेर)-

यह झील उत्तरी राजस्थान में बीकानेर जिले में बीकानेर-श्रीगंगानगर मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 15 पर लूणकरणसर कस्बे के निकट स्थित है।

यह उत्तरी राजस्थान की एकमात्र खारे पानी की झील है।

खारापन कम होने की वजह से स्थानीय मांग की पूर्ति का ही नमक उत्पादित होता है।

राजस्थान में खारे पानी की अन्य प्रमुख झीले-

(1) कावोद एवं पोकरण (जैसलमेर)
(2) डेगाना एवं कुचामन (नागौर)
(3)कोछोर एवं रैवासा (सीकर)
(4) फलौदी (जोधपुर)।

सांभर,डीडवाना,पचपदरा में छोटी छोटी नामक उत्पादक निजी संस्थाएँ है,जिन्हें स्थानीय भाषा मे ‘देवल’ कहते है।

राजस्थान में नमक की सबसे बड़ी मंडी नावां (नागौर) है

मीठे पानी की झीलें-

जयसमंद झील (उदयपुर)-

उदयपुर से 5 1 किमी. द .पू. में स्थित इस झील का निर्माण मेवाड़ के महाराणा जयसिंह द्वारा 1685 ईं. में गोमती नदी पर बाध बनाकर करवाया गया था ।

जयसमन्द विश्व की मीठे पानी की दूसरी सबसे बडी कृत्रिम झील है, जिसे स्थानीय लोग ‘ढेबर झील’ के नाम से जानते हैँ।

झील में कुल सात टापू हैं, जहां भील एवम  मीणा जनजाति के लोग निवास करते हैं । इनमें सबसे बड़े टापू का नाम ‘बाबा का भागड़ा’ एवं दूसरे बडे का नाम ‘प्यारी’ है।

‘बाबा का भागडा’ पर ‘आइलैण्ड रिसोर्ट ‘ नामक होटल स्थित है।

1950 ईं. में जयसमन्द झील से श्यामपुरा एवं भाट नहरें निकाली गई।

जयसमंद के निकट एक पहाडी पर ‘चित्रित हवामहल’ एवं रूठी रानी का भव्य महल स्थित है, जहाँ पर उदयपुर रियासत की शीतकालीन राजधानी होती थी।

राजसमंद झील (राजसमंद)-

यह राज्य की एकमात्र ऐसी झील है जिस पर किसी जिले का नामकरण हुआ है।

राजसमन्द झील का निर्माण उदयपुर के महाराणा राजसिंह द्वारा 1662 ईं. में छोटी गोमती नदी पर बाँध बनवाकर किया गया।

यह झील राजसमन्द जिले में कांकरोली रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है।

झील का उत्तरी भाग ‘नौ चौकी’ कहलाता है जहॉ पर सफेद संगमरमर के 25 विशाल शिलालेखों पर लिखी गई ‘राजप्रशस्ति’ में मेवाड साम्राज्य की स्थापना से लेकर राजसिंह तक का इतिहास संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ की रचना महाराणा राजसिंह के दरबारी कवि ‘रणछोड़ भट्ट’ ने की थी।

राजसमन्द झील के किनारे ‘घेवर माता का मन्दिर’ स्थित है।

पिछोला झील (उदयपुर)-

चौदहवीं शताब्दी में “राणा लाखा” के शासनकाल में एक बंजारे द्वारा पिछोली गांव के निकट इसका निर्माण करवाया गया था । महाराणा उदयसिंह ने इसकी मरम्मत करवाईं।

वर्तमान में यह मनोरम झील उदयपुर नगर के पश्चिम में लगभग 7 किमी. की लम्बाई में फैली है।
सीसारमा व बुझड़ा नदियां इस झील को जलापूर्ति करती हैं।
झील में स्थित दो टापुओं पर ‘जगनिवास’ एबं ‘जगमंदिर’ महल बने हुए हैं । यहां लेक पैलेस होटल है।

महाराणा कर्णसिंह के समय जगमंदिर महल में शहजादा खुर्रम (शाहजहां) ने अपने पिता जहाँगीर से विद्रोह के समय शरण ली थी।

जगमंदिर महल में ही 1857 ईं. में राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महाराणा स्वरूप सिंह ने नीमच की छावनी से भागकर आए 40  अंग्रेजों को शरण देकर क्रांतिकारियों से बचाया था।

जगनिवास महल (लैक पैलेस) विश्व के सुन्दरतम महलों में से एक माना जाता है।

इस महल का निर्माण महाराणा जगतसिंह ने 1746 ईं. में करवाया था।

पिछोला झील के किनारे चामुण्डा माता का मंदिर स्थित है जहॉ देवी के पद-चिन्हों (पगल्या) की पूजा की जाती है।

पिछोला के किनारे ‘उदयपुर का राजमहल’ (city palace) बना हुआ है।

फतेहसागर झील (उदयपुर)-

उदयपुर नगर के उत्तर में स्थित यह झील एक नहर (स्वरूप सागर) द्वारा पिछोला से जुडी हुईं है।

फतेह सागर का निर्माण महाराणा जयसिंह ने 1687 ईं. मे करवाया था, बाद में महाराणा फतेह सिंह ने 1900 ईं. में इसका जीर्णोद्धार करवाया।

इसकी नींव का पत्थर ड्यूक आँफ कनॉट द्वारा रखे जाने के कारण इसे ‘कनॉट बाँध ‘ भी कहते हैँ ।

फतेहसागर झील के किनारे मोती मगरी में महाराणा प्रताप की अश्वारूढ़ धातु प्रतिमा (प्रताप स्मारक) लगी हुईं है।
निकट ही ‘सहेलियों की बाडी’ नामक सुंदर बगीचा स्थित है।

जिसका निर्माण महाराणा संग्राम सिह द्वितीय द्वारा तथा पुनर्निर्माण महाराणा फतेहसिंह द्वारा करवाया गया था।

फतेहसागर झील में एक टापू पर ‘नेहरू पार्क’ तथा दूसरे पर ‘सौर वेधशाला’ स्थित है।

पुष्कर झील (अजमेर)-

अजमेर से 11 किमी. की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में अजमेर-नागौर मार्ग (राष्ट्रीय राज़मार्ग-89) पर भारत में सबसे पवित्र मानी जाने वाली पुष्कर झील स्थित है ।

झील के किनारे कुल 52 घाट बने हुए हैं जिसमें सबसे बड़ा महात्मा गॉधी घाट (गौघाट) है, ब्रह्मघाट एवं वराहघाट भी महत्त्वपूर्ग है|इन घाटों का निर्माण 944 ईं. में मण्डोर के शासक नाहरराव परिहार ने करवाया था।

गौघाट का पुनर्निर्माण मराठा सरदारों ने 1809 ई. में करवाया।
कहा जाता है कि गौघाट पर सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्दसिंह ने 1705 ईं. में गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ किया था।

वर्ष 1911 ईं. में इंग्लैण्ड की महारानी मेरी की यात्रा की याद में पुष्कर के किनारे ‘क्वीन मेरी जनाना घाट’ बनवाया गया। पद्म पुराण के अनुसार पुष्कर सरोवर का निर्माण प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा करवाया गया था।

झील के किनारे ब्रह्माजी का भारत में एकमात्र प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण एवम ब्रह्माजी की मूर्ति की स्थापना आदि शंकराचार्य ने करवाईं थी।
बाद में वर्तमान मंदिर का निर्माण गोकुलचन्द पारीक ने 1809 विक्रमी में करवाया (1752 ई.)।

झील के किनारे सावित्री मंदिर (रत्नगिरी पर्वत की चोटी पर) , रंगनाथ जी (रमा बैकुण्ड) का मंदिर (दक्षिण भारतीय शेली में), बराह मंदिर , आल्मेंश्वर महादेब मंदिर एवं गायत्री मंदिर स्थित हैं।

झील के निकट ही ‘बूढा (वृहद) पुष्कर ‘ एवं कनिष्ठ पुष्कर ‘ नामक तीर्थस्थल स्थित हैं ।

पुष्कर झील के किनारे आमेर के राजा मानसिंह प्रथम द्वारा निर्मित मान महल स्थित है, जहां वर्तमान में आर.टी.डी.सी. द्वारा ‘होटल सरोवर’ संचालित किया जा रहा है ।

पुष्कर में प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिवसीय विशाल मेला भरता है, क्योंकि कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर सरोवर में स्नान करने का विशेष धार्मिक महत्त्व है।
इस दौरान यहां विशाल पशु मेला भी आयोजित होता है ।

कनाडा के सहयोग से इस झील को गहरा व स्वच्छ रखने की योजना चल रही है।

नक्की झील (सिरोही)-

राजस्थान में सर्वाधिक ऊँचाई (1300 मी.) पर स्थित नक्की झील सिरोही जिले में आबूपर्वत पर स्थित है।
भूगोलवेत्ताओँ के अनुसार यह एक ‘ज्वालामुखी क्रेटर झील’ है।
एक किंवदन्ती के अनुसार देवताओं ने अपने नाखूनों से इस झील क्रो खोदा था । इसी कारण इसका नाम नक्की झील’ पडा ।
झील के किनारे रघुनाथ जी का मंदिर, टॉड रॉक, नन रॉक, पैरेंट रॉक, राम झरोखा गुफा, हाथी गुफा एवं चम्पा गुफा स्थित हैँ ।

आनसागर झील (अजमेर)-

अजमेर के निकट नागपहाड़ की तलहटी मे पृथ्वीराज चौहान के पितामह आनाजी ने इस झील का निर्माण 1137 ईं. में करवाया था।
इसके निकट एक पहाडी पर बजरंग गढ़ (हनुमान मंदिर) स्थित है।

इसके किनारे बारादरी का निर्माण शाहजहां ने 1637 ईं. में करवाया था तथा दोलतबाग, जो कि अब सुभाष उद्यान के नाम से जाना जाता है , का निर्माण मुगल बादशाह जहांगीर ने करवाया।

फॉय सागर (अजमेर)-

अजमेर के निकट ही वर्ष 1891-92 में अकाल राहत कार्यों के दोरान एक अंग्रेज अभियन्ता श्री फाय ने बांडी नदी पर बाँध बनाकर फॉयसागर झील का निर्माण करवाया, जो वर्तमान में एक खूबसूरत पिकनिक स्थल है,अधिक भरने पर इसका पानी आनासागर झील में जाता है।

सिलीसेढ झील (अलवर)-

अलवर से 13 किमी. दूर चारों ओर से अरावली पर्वतमालाओं से घिरी सिलीसेढ़ झील लगभग 10 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैली है।
इस झील के किनारे 1845 ईं. में अलवर के महाराजा विनयसिंह ने अपनी रानी शीला के लिए एक शाही शिकारगाह (लॉज) एवं छह मंजिला सुंदर महल बनवाया। इस महल में अब ‘होटल लैक पैलेस’ (R.T.D.C.) संचालित किया जा रहा है

कोलायत झील (बीकानेर)-

बीकानेर रने 50 किमी. दक्षिण में बीकानेर-जैसलमेर मार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग-15) पर कोलायत कस्बे के निकट कपिल मुनि की तपोस्थली ‘कोलायत झील’ स्थित है। कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता थे।

यहॉ पर प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मेले का आयोजन होता है। इस मेले में ‘दीपदान’ का विशेष महत्व है।

नवल सागर/नवलखा झील (बूँदी)-

बूंदी के दुर्ग (तारागढ़) की पहाडी के तलहटी में राजा उम्मेदसिंह द्वारा इस झील का निर्माण करवाया गया।

झील के मध्य में जल देवता ‘वरुण’ का मंदिर आधा डूबा हुआ है।
इस झील के किनारे यहाँ के शासक विष्णुसिंह ने अपनी रामी सुंदरशोभा के लिए सुन्दर महल एवं सुन्दरघाट का निर्माण करवाया।

गैप सागर (डूंगरपुर) (गैब सागर/गैप सागर)-

इस झील का निर्माण महारावल गोपीनाथ ने करवाया था। इसके किनारे ‘उदय विलास महल’ एवं ‘राज राजेश्वर मंदिर’ स्थित है।
झील के भीतर बादल महल एवं इसकी पाल पर महारावल पुंज़राज द्वारा निर्मित्त गोवर्धन नाथ का मंदिर (श्रीनाथ मंदिर), निकट ही फतेहगढी, विवेकानन्द स्मारक, राजा बलि, वागड की मीरां,गवरी बाईं, नाना भाई एवं काली बाईं की प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैँ।

बालसमन्द झील (जोधपुर)-

1159 ईं. में मण्डोर के शासक बालकराव प्रतिहार द्वारा निर्मित इस झील के किनारे ‘होटल लैक पैलेस’ स्थित है

कायलाना झील (जोधपुर)-

इस झील का निर्माण जोधपुर राजपरिवार के सर प्रताप ने करवाया था।
वर्तमान में झील के किनारे माचिया सफारी पार्क (मृगवन) स्थित है ।

उदयसागर झील (उदयपुर)-

महाराणा उदयसिंह द्वारा 1559 से 1564 ई. तक की अवधि में इसका निर्माण किया गया।

आयड़ नदी एसमें आकर गिरती है एवं बेड़च के नाम से निकलती है।

पन्नालाल शाह का तालाब (खेतड़ी, झुंझुनू)-

1870 में सेठ पन्नालाल शाह ने बनवाया।
खेतड़ी के राजा अजीतसिंह के आमंत्रण पर पधारे स्वामी विवेकानंद को इसी तालाब के किनारे बने आवास में ठहराया गया था।

गड़सीसर तालाब (जैसलमेर)-

इसका निर्माण सन 1340 ई. में रावल गड़सीसिंह ने जैसलमेर शहर के निकट करवाया था।
या तालाब 1965 तक पेयजल स्त्रोत था।
इस सरोवर का मेहराबनुमा मुख्य द्वार टीलो नामक एक वेश्या ने बनवाया था। (टीलो की पोल)
इसके किनारे जैसलमेर लोक संस्कृति संग्रहालय स्थित है।

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