भारत_का_इतिहास त्रिपक्षीय संघर्ष पाल_, प्रतिहार_ राष्ट्रकूट_वंश

प्राचीन इतिहास की समाप्ति वर्धन वंश के अंतिम समय और आठवी सदी से दसवीं सदी के बीच उत्तर भारत में तीन वंशो ( #पाल_वंश #प्रतिहार_वंश #राष्ट्रकूट_वंश ) के बीच 100 वर्षों तक संघर्ष चला जिसे इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से जाना गया हैं यह संघर्ष तत्कालीन सता के प्रमुख केंद्र कन्नौज को लेकर था क्योंकि कनौज पर शासन स्थापित करने का अर्थ था उपरी गंगा घाटी , उसके व्यापार , एंव प्रचुर मात्रा में कृषि संसाधनों पर नियन्त्रण क्र लेना था इसिलए इन तीनो वंशो के बीच संघर्ष हुआ!-By Dharmendar Gour

प्रमुख शासक तीनो वंशो के

table.tableizer-table { font-size: 16px; border: 1px solid #CCC; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; } .tableizer-table td { padding: 4px; margin: 3px; border: 1px solid #CCC; } .tableizer-table th { background-color: #1D368B; color: #FFF; font-weight: bold; }

वंश पाल वंश प्रतिहार वंश राष्ट्रकूट वंश
क्षेत्र बंगाल गुजरात राजस्थान कर्नाटक, महाराष्ट्र
  गोपाल नागभट प्रथम दन्तिदुर्ग
  धर्मपाल वत्सराज कृष्ण प्रथम
  देवपाल नागभट द्वितीय ध्रुव
  विग्रहपाल मिहिरभोज गोविन्द III
  नारायणपाल महेन्द्रपाल प्रथम अमोधवर्ष
  महिपाल प्रथम महिपाल प्रथम कृष्ण द्वितीय
  रामपाल   इंद्रा III

पाल वंश (पूर्वी भारत बंगाल क्षेत्र)

गोपाल

गोपाल पाल को पाल वंश का संस्थापक माना जाता है
गोपाल पाल बौद्ध धर्म का अनुयाई था
गोपाल ने बिहार सरीफ के निकट औदंतिपुर विहार की स्थापना करवाई

धर्मपाल

उसने विस्तार नीति का अनुसरण करके पुरे मगध को अपने राज्य में शामिल क्र लिया था
धर्मपाल ने महाराजाधिराज, परमभट्टारक तथा परमेश्वर की उपाधि धारण की थी
धर्मपाल को उत्तरापथ कहा जाता है
धर्मपाल ने भागलपुर बिहार में विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई

देवपाल

देवपाल योग्यएवं महत्वाकांक्षी शासक था
गोपाल पाल ने युद्ध में हूणों को परास्त किया था
गोपाल पाल ने प्रतिहार वंश के प्रसिद्ध शासक मिहिर भोज को युद्ध में पराजित किया था
देवपाल का शासन क्षेत्र हिमालय से लेकर विंध्याचल तक फैला हुआ था
देवपाल के दरबार में बौद्ध कवि वज्रदत्त रहता था,वज्रदत्त ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘लोकेश्वरशतक’ की रचना की थी

विग्रहपाल प्रथम

विग्रहपाल को प्रतिहार शासक मिहिरभोज प्रथम ने युद्ध में पराजित किया था!

नारायणपाल

नारायणपाल के समय पाल साम्राज्य की शक्ति क्षीण होने लगी थी,
पाल वंश के इतिहास में नारायणपाल के काल को अवनत काल के नाम से जाना जाता है

महीपाल प्रथम

महीपाल प्रथम एक अत्यंत पराक्रमी योग्य शासक था
चोल वंश के राजा राजेंद्र ने महीपाल पर आक्रमण किया था और इस युद्ध में महीपाल की पराजय हुई

विग्रहपाल तृतीय

पाल वंश का अंतिम पराकर्मी शासक था इसके बाद पाल वंश का इतिहास समाप्त होने लगा

गुर्जर प्रतिहार वंश (उतरी पच्छिमी गुजरात पच्छिमी मध्यप्रदेश व राजस्थान का क्षेत्र )

नागभट्ट प्रथम

प्रतिहार वंश के संस्थापक नागभट्ट प्रथम था !
इसकी राजधानी उज्जैन थी और राजस्थान में भीनमाल थी!
नागभट्ट प्रथम के समय अरबों का भारत पर आक्रमण हुआ!

वत्सराज

प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली शासक वत्सराज था !
सम्राज्य विस्तार के क्रम में कन्नौज पर आक्रमण की शुरुआत पच्छिम की और से वत्सराज ने ही की थी
वत्सराज ने कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर पाल शासक धर्मपाल को भी परास्त किया!
राष्ट्रकूट के शासक ध्रुव के हाथों वत्सराज की हार हुई!

नागभट्ट द्वितीय

नागभट्ट द्वितीय ने चकरायुद्ध को परास्त कर कन्नौज को राजधानी बनाया
पाल शासक धर्मपाल को भी परास्त किया.
राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय के हाथों परास्त हुआ।

मिहिर भोज

प्रतिहार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक मिहिर भोज थे !
मिहिर भोज की जानकारी अरब यात्री सुलेमान के विवरण से मिलती है
मिहिरभोज पहले पाल शासक देवपाल से हारा और राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय से भी हारा लेकिन पुनः पाल शासक नागभट्ट को हराया और राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय को भी हराया ।
मिहिर भोज ने आदिवराह और प्रभास की उपाधि धारण किया

महेंद्रपाल प्रथम

महेंद्रपाल के दरबार में प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर रहते थे
राजशेखर ने काव्यमीमांसा, बाल भारत, भुवनकोश , कर्पूरमंजरी, बाल रामायण,विद्धशालभंजिका, और हरिविलास की रचना की

महिपाल

समय बगदाद यात्री अल मसूदी ने भारत की यात्रा किया।
महिपाल के समय प्रतिहार वंश का विघटन प्रारंभ हो गया
समय 1018 में मोहम्मद गजनबी ने कन्नौज पर आक्रमण कर आधिपत्य कायम कर लिया

अंतिम शासक

यशपाल

राष्ट्रकूट वंश (दक्षिण भारत कर्नाटक,महाराष्ट्र का क्षेत्र)

दंतिदुर्ग

राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक दंतिदुर्ग थे
दंतिदुर्ग ने अपनी राजधानी मान्यखेत शोलापुर के निकट, (वर्तमान का मानखेड़ ) को बनाया
दंतिदुर्ग ने महाराजधिराज, परमेश्वर तथा परम भटनागर की उपाधि धारण कि

कृष्ण प्रथम

कृष्ण प्रथम ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर बनवाया

ध्रुव

इन्होंने श्रीवल्लभ तथा धारावर्ष की उपाधि धारण किया
चालुक्य नरेश विष्णु वर्मन तथा पल्लव नरेश नंदीवर्मन को हराया और कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया
प्रतिहार नरेश वत्सराज और पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।

गोविंद तृतीय

राष्ट्रकूट वंश के सबसे शक्तिशाली शासक हुए इन्होंने भी प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय और पाल शासक धर्मपाल को हराया

अमोघवर्ष

ये शांतिप्रिय तथा विद्वान थे उन्होंने कविराजमार्ग नामक कन्नड़ की रचना कि
इनके दरबार में गणितसार संग्रह के रचनाकार महावीराचार्य और अमोघवृत्ति की रचनाकार साकतायन रहते थे आदि पुराण की रचनाकार जिनसेन रहते थे

इंद्र तृतीय

राष्ट्रकूट वंश के अंतिम शक्तिशाली शासक इंद्र तृतीय हुआ
मालवा के परमार शासक उपेंद्र को परास्त किया और राजधानी उज्जैनी पर अधिकार कर लिया
प्रतिहार शासक महिपाल को भी परास्त किया तथा कन्नौज पर अधिकार कर लिया
इन्होंने नित्यवर्ष और रत्ताकन्दरपा की उपाधि धारण कि

कृष्ण तृतीय

कृष्ण तृतीय के दरबार में कन्नड़ भाषा का महान कवि तथा शांति पुराण के रचयिता पोन्न रहते

Author: admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *