भारतीय संविधान की प्रस्तावना व्याख्या सहित

भारतीय संविधान की प्रस्तावना

हम भारत के लोग भारत को एक

सम्पुर्णप्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी ,पंथनिरपेक्ष ,लोकतन्त्रात्मक गणराज्य 

बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकां को

सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक न्याय

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए
तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमां और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने
वाली बन्धुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में
आज तारिख 26 जनवरी 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमीं संवत् 2006 विक्रमी)
को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगिकृत ,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं!

प्रस्तावना क्या हैं 

प्रस्तावना संविधान का पहला पेज हैं
प्रस्तावना संविधान का सार हैं
प्रस्तावना संविधान का भाग हैं 

प्रस्तावना में भारत शब्द का प्रयोग कितनी बार हुआ हैं 

2 बार
(हम भारत के लोग भारत को)

प्रस्तावना की व्याख्या

हम भारत के लोगः-

यह लाईन अमेरिका से ली गयी हैं इसका तात्पर्य हैं की भारत में जनता सम्प्रभु हैं, जनता ही सर्वोच्च हैं, और भारत में शासन करने की अंतिम शक्ति जनता के पास हैं 

हमारा भारत सम्पुर्णप्रभुत्वसम्पन्न,समाजवादी,पंथनिरपेक्ष,लोकतन्त्रात्मक होगा

संपूर्णप्रभुत्वसंपन्नः- 

संप्रभुता शब्द सबसे पहले ज्याबोंदे ने अपनी पुस्तक रिपब्लिका में दिया इसका तात्पर्य हैं की बिना किसी आंतरिक व बाहरी दबाव के निर्णय लेंने की स्वतंन्त्रता

समाजवादीः- 

यह शब्द मूल संविधान में नहीं था 42वें संविधान संसोधन द्वारा जोड़ा गया, भारतीय समाजवाद मार्क्सवाद $ गांधीवाद का मिश्रण हैं लेकिन झुकाव गांधीवाद की और हैं इसका तात्पर्य- उत्पादन के साधनों पर सरकार यां समाजवाद का स्वामित्व होना उत्पादन के साधन 5 प्रकार के हैं 1.भूमी 2.पूंजी 3. श्रम 4.साहस 5.उघमीं समाजवाद का उद्वेश्य निम्न से उच्च वर्ग का कल्याण तथा समाजवाद का आधार हैं आर्थिक समानता 

पंथनिरपेक्ष :- यह शब्द भी मूल संविधान में नहीं था 42वें संविधान संसोधन द्वारा जोड़ा गया,इसका तात्पर्य की राज्य का कोई धर्म नहीं होगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं की भारत एक अधार्मिक देश हैं यां धर्म का विरोध करता हैं हमनें संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द का उपयोग न करके पंथनिरपेक्ष शब्द का उपयोग किया
धर्मनिरपेक्ष शब्द का उदय 16वीं सदी में युरोप में पुर्नजागरण के समय हुआ क्योंकि जो ईसाई धर्म के पादरी थे वे भ्रष्ट हो गये थे अर्थात अपनें पथ से भटक गये थे धर्म का महत्व कम हो गया था इसी समय धर्मनिरपेक्ष शब्द प्रचलन में आया, युरोप के धर्मनिरपेक्ष से हमारी पंथनिरपेक्षता अधिक व्यापक हैं क्योंकि हमारा संविधान धर्मा से ही नहीं अपितू पंथो से भी दूर रहनें की बात करता हैं
लोकतांत्रिक :-लोगों का लोगों के द्वारा प्रतिनिधीमुलक शासन जनता प्रत्यक्ष रूप से सांसद और विधायक को चुनती हैं तथा सांसद और विधायक जनता का प्रतिनिधी बनकर संसद और विधानमण्डल में जनता का प्रतिनिधीत्व करते हैं
लोकतन्त्र दो प्रकार का होता हैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष

विचार ,अभिव्यक्ति ,विश्वास ,धर्म , और उपासना की स्वतंत्रता :- यह स्वतंत्रता के शब्द फ़्रांस की क्रांति से लिए गए हैं ! संविधान की प्रस्तावना  में जनता को 5 प्रकार की स्वतंत्रता दी गयी है जो अनुच्छेद 19 में दी गयी 6 स्वतन्त्रता से अलग हैं
अनुच्छेद 19 की 6 स्वतन्त्रता : –
1.भाषण व अभिव्यक्ति की  2. सभा करने की
3.संगठन बनाने की            4.प्रवास की
5.निवास की                    6.आजीविका की

इन स्वतंत्रता के हनन पर कानून का दरवाजा खटखटाया जा सकता हैं
प्रतिष्ठा और अवसर की समानता :- भारत के संविधान की प्रस्तावना में 2 प्रकार की समानता दी गयी हैं ! समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव सामान अवसर दिए जायेंगे !
बंधुता :- संविधान की एकल नागरिकता भाईचारे की भावना को प्रोत्सहित करता हैं!
व्यक्ति की गरिमा ,राष्ट्र की एकता अंखडता:-प्रस्तावना में उल्लेखित शब्द व्यक्ति का सम्मान तथा देश की एकता अखंडता द्वारा बन्धुता की भावना को प्रोत्साहित करता हैं

Author: admin

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